Section 12 – Voidable Marriages (रद्द करने योग्य विवाह)
🪔 Hindu Marriage Act, 1955
Section 12 – Voidable Marriages (रद्द करने योग्य विवाह)
🔹 Section 12 का परिचय
Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 12 (Section 12) उन विवाहों से संबंधित है जिन्हें voidable (रद्द करने योग्य) माना जाता है।
👉 मतलब: विवाह शुरू में वैध माना जाएगा, लेकिन यदि किसी पक्ष की अनुमति या क्षमता में समस्या पाई जाती है, तो पक्ष अदालत में इसे रद्द करा सकता है।
🎯 Section 12 का उद्देश्य
- विवाह में सहमति और मानसिक क्षमता की सुरक्षा करना
- ऐसे विवाहों को पहचानना जहाँ शादी अनैतिक या अवैध परिस्थितियों में हुई हो
- पक्षों को न्यायिक माध्यम से विवाह रद्द कराने का अधिकार देना
⚖️ Section 12 के अंतर्गत Marriage Voidable होने के कारण
Marriage तब voidable (रद्द करने योग्य) मानी जाएगी यदि:
- किसी पक्ष ने विवाह के समय पर्याप्त समझदारी / mental capacity नहीं दिखाई हो
- विवाह विवाह की अवधि में unsound mind / मानसिक अस्थिरता के कारण किया गया हो
- विवाह बाध्यकृत या बलपूर्वक (coercion / fraud) किया गया हो
📌 ध्यान दें: Voidable marriages शुरुआत में वैध होती हैं, लेकिन केवल court की order से रद्द की जा सकती हैं।
🚸 Practical Examples (व्यावहारिक उदाहरण)
- Marriage में किसी पक्ष ने सहमति (consent) नहीं दी या झूठ के कारण शादी की
- मानसिक अस्थिरता के कारण विवाह में समझदारी नहीं दिखी
- Fraud या cheating से विवाह कराया गया (जैसे पति ने पहले से शादी छुपाई)
💰 Legal Effect / Remedy
- विवाह रद्द करने का निर्णय court के discretion पर निर्भर करता है
- यदि रद्द किया जाता है, तो दोनों पक्ष कानूनी रूप से single माने जाते हैं
- Property, maintenance या inheritance rights court के order पर तय होते हैं
📝 संक्षेप में (Summary)
| बिंदु | विवरण |
| Section | 12 |
| Topic | Voidable Marriages |
| अर्थ | रद्द करने योग्य विवाह |
| कारण | Unsound mind, Lack of Consent, Coercion, Fraud |
| Legal Effect | Court order से रद्द, property & rights court discretion पर |
⚠️ Important Points
Section 12 में बताए गए कारणों से विवाह initially valid होता है,
लेकिन court की order से रद्द किया जा सकता है।
⚖️ Legal Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी हेतु है। वास्तविक मामलों में विवाह की वैधता और रद्द करने का निर्णय न्यायालय के विवेक और परिस्थिति पर निर्भर करता है।
