Section 13B – Mutual Consent Divorce (संयुक्त सहमति से तलाक)

🪔 Hindu Marriage Act, 1955

Section 13B – Mutual Consent Divorce (संयुक्त सहमति से तलाक)

🔹 Section 13B का परिचय

Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 13B (Section 13B) उन तलाकों से संबंधित है जहाँ पति और पत्नी दोनों सहमत होकर तलाक चाहते हैं

👉 इसे आम भाषा में Mutual Consent Divorce कहा जाता है।

🎯 Section 13B का उद्देश्य

  • पति-पत्नी के बीच मित्रतापूर्ण और समझदारीपूर्ण समाधान सुनिश्चित करना
  • विवादित तलाक (Contested Divorce) की लंबी प्रक्रिया से बचाना
  • बच्चों, संपत्ति और मेंटेनेंस संबंधी मामलों में सहमति पर आधारित समाधान देना

⚖️ Section 13B के अंतर्गत प्रमुख प्रावधान

  1. पति और पत्नी दोनों अदालत में लिखित आवेदन दें।
  2. तलाक के लिए दोनों पक्षों की सहमति (consent) आवश्यक है।
  3. आवेदन में तलाक के लिए विवाह विफलता का प्रमाण देना होता है।
  4. अदालत दोनों पक्षों को 6 महीने का विचारकाल (cooling period) देती है।
  5. यदि 6 महीने में स्थिति सुधार नहीं होती, तो अदालत तलाक को grant कर देती है

📌 ध्यान दें: Mutual Consent Divorce में सभी विवादित मुद्दे (child custody, alimony, property) लिखित समझौते से हल हो सकते हैं।

🚸 Practical Examples (व्यावहारिक उदाहरण)

  • पति और पत्नी आपस में सहमत होकर शादी टूटने का निर्णय लेते हैं।
  • बच्चों की custody, maintenance और property की division पर सहमति होती है।
  • कोई पक्ष अदालत में विवाद नहीं करता।

💰 Legal Effect / Remedy

  • Divorce granted होने पर marriage legally dissolved हो जाता है।
  • Maintenance, alimony, child custody court-approved agreement के अनुसार तय होती है।
  • Property rights भी दोनों की सहमति और court order से तय होते हैं।

📝 संक्षेप में (Summary)

बिंदु विवरण
Section 13B
Topic Mutual Consent Divorce
अर्थ संयुक्त सहमति से तलाक
आवश्यकताएँ दोनों पक्षों की सहमति, अदालत में आवेदन, Cooling Period
Legal Effect Marriage dissolved, Alimony/Child Custody/Property court-approved agreement

⚠️ Important Points

Mutual Consent Divorce सबसे तेज़ और सरल तरीका है।
सभी मुद्दों पर लिखित समझौता होना आवश्यक है।

️ Legal Disclaimer

यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी हेतु है। वास्तविक मामलों में तलाक और संबंधित अधिकार न्यायालय के विवेक और प्रमाणों पर निर्भर करते हैं।